भीतर का मौसम
हम ढूंढे यहाँ अपनी ख़ुशी
हर चेहरे की मुस्कान में,
कभी दोस्त की मीठी बातें,
कभी अपनों की पहचान में।
किसी की मुस्कान पर
कभी फागुन-से खिलते थे,
कभी किसी के तिरछे सुर से
हम दीपक-से हिलते थे।
लोग बदलें दिन प्रतिदिन,
रूप नए वो धरते थे,
हम भी उनकी छाया में
अपने रंग बदलते थे।
फिर इक दिन, ख़ुद से पूछा
ऐसे क्यों मैं झुकता हूँ,
तब जाना भीतर ही से मैं
अपना मौसम चुनता हूँ।
न सुख बाहर से मिलता है,
न दुख किसी का बोया है;
मेरे अपने ही चिंतन से
दिल हँसा कभी, कभी रोया है।
जो कुछ भी छूकर जाता है,
क्षण भर ही मन में बसता है;
लम्हे आते, लम्हे जाते,
समय सबको हर लेता है।
आज जो कुछ है, उसको जी लो
चाहे मुस्कान या कसक हल्की;
अंतर्मन अंततः वही होगा
जिसकी भांति तुमने चुनली।